कुछ साल पहले भारत देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, समय-समय पर अनेकों क्रान्तिवीरों ने देश को आजाद करवाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। भारत भूमि सच्चे वीरों की भूमि है। देश में भगत सिंह, सुखेदव, राजगुरु, सुभाष, आजाद, असफाक उल्ला खां, बिरसा मुण्डा, मतादीन भंगी जैसे हजारों राष्ट्रवादी क्रान्तिकारियों की पूरी टोली ने अंग्रजों को जड़ से उखाड़ फेंकने में खुद को देश के नाम कर दिया। उन वीरों में ऊधम सिंह का नाम भी शामिल है। ऊधम सिंह को उनके अपेक्षाकृत कम जीवन में कई चरणों में जाना जाता था, निम्नलिखित नाम थे: शेर सिंह, ऊधम सिंह, उधन सिंह, उदय सिंह, उदय सिंह, फ्रैंक ब्राज़ील और राम मोहम्मद सिंह आज़ाद।
शहीद ऊधम सिंह (26 दिसम्बर 1899 से 31 जुलाई 1940) का नाम भारत की आज़ादी की लड़ाई में पंजाब के क्रान्तिकारी के रूप में दर्ज है। उन्होंने जलियांवाला बाग कांड के समय पंजाब के गर्वनर जनरल रहे माइकल ओ' ड्वायर (en:Sir Michael Francis O'Dwyer) को लन्दन में जाकर गोली मारी। कई इतिहासकारों का मानना है कि यह हत्याकाण्ड ओ' ड्वायर व अन्य ब्रिटिश अधिकारियों का एक सुनियोजित षड्यंत्र था, जो पंजाब पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए पंजाबियों को डराने के उद्देश्य से किया गया था। यही नहीं, ओ' ड्वायर बाद में भी जनरल डायर के समर्थन से पीछे नहीं हटा था।
मिलते जुलते नाम के कारण यह एक आम धारणा है कि ऊधम सिंह ने जालियाँवाला बाग हत्याकांड के उत्तरदायी जनरल डायर (पूरा नाम - रेजिनाल्ड एडवार्ड हैरी डायर, Reginald Edward Harry Dyer) को मारा था, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि प्रशासक ओ' ड्वायर जहां ऊधम सिंह की गोली से मरा (सन् १९४०), वहीं गोलीबारी को अंजाम देने वाला जनरल डायर १९२७ में पक्षाघात तथा कई तरह की बीमारियों से ग्रसित होकर मरा।
उत्तर भारतीय राज्य उत्तराखण्ड के एक ज़िले का नाम भी इनके नाम पर ऊधम सिंह नगर रखा गया है।
जीवन वृत्त
ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में काम्बोज परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार तहल सिंह और माता का नाम नारायण कौर था। उनके पिता पास के एक गाँव उपल्ल रेलवे क्रासिंग के चौकीदार थे। सन 1901 में ऊधमसिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। ऊधमसिंह का बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्तासिंह था जिन्हें अनाथालय में क्रमश: ऊधमसिंह और साधुसिंह के रूप में नए नाम मिले। इतिहासकार मालती मलिक के अनुसार ऊधमसिंह देश में सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है।
अनाथालय में ऊधमसिंह की जिन्दगी चल ही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया। वह पूरी तरह अनाथ हो गए। 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शमिल हो गए। ऊधमसिंह अनाथ हो गए थे, लेकिन इसके बावजूद वह विचलित नहीं हुए और देश की आजादी तथा डायर को मारने की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए लगातार काम करते रहे।
ऊधमसिंह 13 अप्रैल 1919 को घटित जालियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई। इस घटना से वीर ऊधमसिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए ऊधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। सन् 1934 में ऊधम सिंह लंदन पहुंचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा।
ऊधम सिंह शहीद भगत सिंह के विचारों से प्रेरित
ऊधम सिंह भगत सिंह के कार्यों और उनके क्रन्तिकारी समूह से बहुत ही प्रभावित हुए थे। 1935 जब वे कश्मीर गए थे, उन्हें भगत सिंह के तस्वीर के साथ पकड़ा गया था। उन्हें बिना किसी अपराध के भगत सिंह का सहयोगी मान लिया गया और भगत सिंह को उनका गुरु। ऊधम सिंह को देश भक्ति गीत गाना बहुत ही अच्छा लगता था और वे राम प्रसाद बिस्मिल के गीतों के बहुत शौक़ीन थे जो क्रांतिकारियों के एक महान कवी थे।
कश्मीर में कुछ महीने रहने के बाद, ऊधम सिंह ने भारत छोड़ा। 30 के दशक में वे इंग्लैंड गए। ऊधम सिंह जलियावाला बाग हत्या कांड का बदला लेने का मौका ढूंढ रहे थे। यह मौका बहुत दिन बाद 13 मार्च 1940 को आया।
माइकल ओ'ड्वायर की गोली मारकर हत्या
ऊधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। ऊधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुंच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके।
बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए ऊधम सिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। ऊधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। 4 जून 1940 को ऊधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।
शहीद ऊधम सिंह काम्बोज भारत के महान देशभक्तों में से एक थे, जिनकी मातृभूमि को ब्रिटिश उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के चंगुल से मुक्त देखने की तीव्र इच्छा थी। यह संदेश हमारे समुदाय और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान शहीद को समृद्ध श्रद्धांजलि और श्रद्धांजलि है। शहीद ऊधम सिंह काम्बोज ने जलियांवाला बाग अमृतसर के नरसंहार का बदला लिया, जिसमें कई देशभक्तों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश सरकार के अत्याचार के खिलाफ सर्वोच्च बलिदान दिया। काम्बोज सोसाईटी की तरफ से शहीद ऊधम सिंह को कोटि कोटि नमन। शहीद ऊधम सिंह की जय !!!
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